19वीं शताब्दी में प्रचलित था एक भयानक ट्रेंड, की जाती थी मृत बच्चों को जीवित दिखाने की कोशिश

19वीं शताब्दी में US और यूरोप में पोस्टमॉर्टम तस्वीरों का चलन था, यानि लोगों के मरने के बाद उनकी तस्वीरें ली जाती थीं. इस चलन की शुरुआत 1839 में हुई थी और दस सालों के अन्दर ही ये ट्रेंड फ़ैल गया. इन तस्वीरों में ऐसा दिखाया जाता था कि मृत बच्चा सो रहा है, पर कभी-कभी उन्हें जीवित दिखाने के लिए उनकी आंखें भी खोल दी जाती थीं.

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आज के ज़माने में ये बात बहुत अजीब लग सकती है, पर उस समय वाकई माएं भी अपने मृत बच्चों के साथ पोज़ दिया करती थीं. तब कई महामारियां फैलती थीं, जिनका इलाज उस समय नहीं हो पाता था. इस वजह से कई बच्चों की मृत्यु हो जाती थी.

इस तरह की तस्वीरें खिंचवा कर लोग अपने बच्चों की यादों को संजोने की कोशिश किया करते थे. उस समय तस्वीरें खिंचवाने में बहुत पैसे लगा करते थे, इसलिए कुछ ही लोग इसका खर्चा उठा पाते थे.

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बीसवीं सदी आते-आते ये चलन ख़त्म होने लगा था. इसकी शुरुआत फ़्रांस के Louis-Jacques-Mandé Daguerre ने 1839 में की थी.

कई अमेरिकी मां-बाप बच्चों का अन्तिम संस्कार करने से पहले अपने बच्चों की आखरी याद के रूप में ये तस्वीरें खिंचवाते थे. इन तस्वीरों का बड़ा संग्रह Thanatos Archive में है.

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तस्वीरों में छोटे बच्चों की आंखें बंद होती थीं, जैसे वो चैन की नींद सो रहे हों. पर कभी-कभी कुछ बच्चों की आंखें खोल भी दी जाती थीं, जिससे लगे कि वो ज़िन्दा हैं. उन्हें टेबल या कुर्सी के सहारे बैठा दिया जाता था. कुछ बच्चों की बंद पलकों पर ही आंखें बना दी जाती थीं. उनके गालों पर लाली लगा कर उन्हें जीवित दिखाने की कोशिश की जाती थी. यही नहीं, कई बार तो उन्हें अपने जीवित बहन भाइयों के साथ भी बैठा दिया जाता था. कई लोगों को ये तस्वीरें डरावनी और हृदयविदारक लगती हैं.

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जैसे-जैसे तस्वीरें खिंचवाना आसान और सस्ता होता गया, इस तरह की तस्वीरों का चलन भी ख़त्म होता गया, क्योंकि अब जीवित रहते भी मां-बाप अपने बच्चों की तस्वीरें ले पाते थे. Grief Counsellors भी बच्चों के मरने के बाद उनकी तस्वीरें न लेने की सलाह देते हैं.

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