रघुराम राजन के प्रोफेसर आलोक 25 सालों से आदिवासियों के बीच रहकर दे रहे उनके बच्चों को शिक्षा

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आपने अब तक सूटबूट पहने हुए हाथ में बुक्स लेकर चलते हुए प्रोफेसर तो जरूर देखें होंगे लेकिन क्या आपको कभी किसी ऐसे प्रोफेसर को देखा है, जिसके उलझे हुए बड़े-बड़े बाल हो, बढ़ी हुई दाढ़ी हो, हाथ में एक झोला और पैरों में टायर की बनी चप्पल हो? बेशक आपका जवाब ना होगा. लेकिन यहां हम आपको एक ऐसे ही प्रोफेसर के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि बड़े बाल और झोला लेकर चलते हैं और यह हैं आईआईटी दिल्ली के एक प्रोफेसर आलोक सागर.

आलोक का जन्म 20 जनवरी 1950 को दिल्ली में हुआ था. उन्होंने आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रॉनिक में इंजीनियरिंग की है. आलोक का ऐसा हुलिया रखने का कारण यह है कि वह गरीब आदिवासियों को जिंदगी बदलने का तरीका सिखाना चाहते हैं लेकिन अपनी पहचान छुपाकर. आलोक आलोक RBI गवर्नर रह चुके रघुराम राजन के अलावा और भी कई जाने माने लोगों को पढ़ा चुके हैं.

आलोक ने साल 1977 में अमेरिका के हृयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध की डिग्री ली. इसके बाद उन्होंने टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डाक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फैलोशिप भी की. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए. लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा और उन्होंने नौकरी छोड़ डी. जिसके बाद वे यूपी, मप्र, महाराष्ट्र में रहने लगे. आलोक सागर के साथ ही उनके भाई बहन भी काफी पढ़े लिखे हैं और उन्होंने भी कई डिग्रियां ले रखी हैं.

हायर एजुकेशन के साथ ही आलोक सागर को कई भाषाओं का ज्ञान है. उनके पिता सीमा व उत्पाद शुल्क विभाग में कार्यरत थे. उनका छोटा भाई अंबुज सागर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर है वहीं बहन अमेरिका कनाडा में और एक बहन जेएनयू में कार्यरत थीं. आलोक सागर को विदेशी भाषाओं के साथ साथ आदिवासी भाषा भी अच्छे से बोल लेते हैं. आलोक 25 सालों से आदिवासियों के बीच रह रहे हैं. उनका पहनावा भी आदिवासियों जैसा ही है. वे अपनी पहचान छुपाकर आदिवासियों के साथ रहते थे. लेकिन कुछ दिनों पहले घोड़ाडोंगरी उपचुनाव में उनके खिलाफ कुछ लोगों ने बाहरी व्यक्ति होने की शिकायत दर्ज की जिसके बाद पुलिस की जांच में आलोक की सच्चाई सामने आई कि वे एक ग्रामीण नहीं बल्कि एक पूर्व प्रोफेसर हैं.

1990 से आलोक ने अपनी सारी डिग्रियां संदूक में बंद कर दी थी. फिलहाल वे बैतूल जिले में कई सालों से आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन जी रहे हैं. वे आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों के लिए लड़ते हैं. इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं. सामान्य जीवन जीने के अलावा वे पूरे गांव में साइकिल से घूमते हैं. दिन भर वे आदिवासी बच्चों को पढ़ाते हैं. अपने लगाए हुए पौधों की देखभाल करते हैं. उत्तरप्रदेश के बांदा, जमशेदपुर, सिंह भूमि, होशंगाबाद के रसूलिया, केसला में रहने के बाद से वे साल 1990 से कोचमहू गांव में ही रह रहे हैं.

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