मेघालय में फंसे खदान मज़दूरों पर आधारित इस स्टैंडअप एक्ट का हर पंच मीडिया के लिए तमाचा है

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जब-जब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिपल्ब कुमार देब के बयानों पर राष्ट्रीय मीडिया डिबेट करती थी, बाल की खाल निकाल देती थी, राई का पहाड़ बना देती थी तब-तब मैं भीतर ही भीतर ख़ुश भी होता था कि चलो इसी बहाने राष्ट्रीय मीडिया में नॉर्थ ईस्ट को जगह तो मिल रही है.

लेकिन मैं मुग़ालते में था, क्योंकि जब असल में भारत के नॉर्थ ईस्ट इलाके को मुख्यधारा के मीडिया की ज़रूरत पड़ी तो उन्होंने अपना मुंह फ़ेर लिया और अपने किले (स्टूडियो) में दुबके रहे.

13 फ़रवरी को एक अवैध कोयला खदान में 15 मज़दूर पानी भर जाने की वजह से फंस गए थे. इस घटना को अब महीना होने वाला है. बचाव कार्य युद्धस्तर पर चालू हैं लेकिन संभावना कम है कि इतने दिनों तक मज़दूर अंदर जीवित बचे होंगे.

ये नौबत आयी क्यों? उन 15 मज़दूरों की ज़िंदगी की आस ख़त्म कैसे हो गई, ये उम्मीद की डोरी एक दिन में नहीं टूटी है, इसके लिए पूरे 28 दिन लगे हैं.

इस पूरी घटना के ऊपर मेघालय के एक स्टैंडअप कमीडियन अभिनीत मिश्रा ने बहुत ही तीखे अंदाज़ में एक स्टैंडअप(लेकिन कॉमेडी नहीं) किया है. आपको अभिनीत की बातों पर पहले तो हंसी आएगी फिर धीरे-धीरे वो हंसी गुस्से में बदलती जाएगी.

काश! मेघालय के किसी सिनेमाघर में किसी ने राष्ट्रगान पर खड़े होने से मना कर दिया होता तो शायद इसी बहाने दिल्ली की मीडिया अपने कैमरे के फ़ोकस में मेघालय को लेती और उन्हें ग़लती से खदान में फंसे मज़दूर दिख जाते.

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